दुनियाभर में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच अमेरिका से एक बड़ा फैसला सामने आया है। Facebook और Instagram की पैरेंट कंपनी Meta को बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर हुए कानूनी विवाद के बाद अपने प्लेटफॉर्म में कई महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार कंपनी ने अरबों डॉलर के समझौते के साथ युवाओं के लिए सुरक्षा उपायों को मजबूत करने पर सहमति जताई है।
इस मामले की शुरुआत उन आरोपों से हुई जिनमें कहा गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया गया कि किशोर उपयोगकर्ता लंबे समय तक ऐप्स पर बने रहें। कई राज्यों ने दावा किया कि लगातार नोटिफिकेशन, लाइक्स, रील्स और एल्गोरिदम आधारित कंटेंट बच्चों को अधिक समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं। Meta ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया, लेकिन लंबे कानूनी संघर्ष से बचने के लिए समझौते का रास्ता चुना।
समझौते के तहत सबसे चर्चित बदलाव दैनिक उपयोग सीमा को लेकर है। प्रस्तावित व्यवस्था में 18 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं के लिए Facebook और Instagram के इस्तेमाल पर समय सीमा तय की जा सकती है। इसके अलावा रात के समय प्लेटफॉर्म उपयोग पर भी प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं लागू की जाएंगी ताकि किशोर देर रात तक सोशल मीडिया पर सक्रिय न रहें।
स्कूल के समय नोटिफिकेशन कम करने, लाइक्स और रिएक्शन को डिफॉल्ट रूप से छिपाने तथा कुछ ब्यूटी फिल्टर्स पर नियंत्रण जैसे कदम भी इस योजना का हिस्सा बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बच्चों पर सोशल मीडिया तुलना और डिजिटल दबाव का असर कुछ हद तक कम हो सकता है।
यह बदलाव केवल तकनीकी सुधार नहीं माने जा रहे, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी पर चल रही वैश्विक बहस का हिस्सा हैं। कई देशों में पहले से ही बच्चों के लिए सोशल मीडिया नियमों को सख्त करने पर चर्चा चल रही है। अमेरिका में हुआ यह समझौता अन्य देशों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।
भारत में फिलहाल ऐसे नियम लागू नहीं हुए हैं, लेकिन यहां भी बच्चों और किशोरों में बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञ मानते हैं कि संतुलित डिजिटल उपयोग और अभिभावकों की निगरानी आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।
सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने, जानकारी पहुंचाने और नई संभावनाएं खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर उठ रहे सवाल अब टेक कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि दुनिया के अन्य देश भी इस दिशा में किस प्रकार के कदम उठाते हैं।

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