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ला नीना क्या है? भारत के मौसम और मानसून पर इसका क्या असर पड़ता है

 

ला नीना क्या है? भारत के मौसम और मानसून पर इसका क्या असर पड़ता है

मौसम की दुनिया में ला नीना एक ऐसी प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसका असर हजारों किलोमीटर दूर तक महसूस किया जा सकता है। प्रशांत महासागर के पानी के तापमान में होने वाला बदलाव हवाओं और वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है और इसका असर बारिश तथा तापमान के पैटर्न पर पड़ सकता है। भारत के लिए भी यह घटना महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि प्रशांत महासागर की स्थिति दक्षिण-पश्चिम मानसून को प्रभावित करने वाले प्रमुख जलवायु संकेतकों में शामिल है।

हालांकि, सितंबर 2026 में प्रशांत महासागर में ला नीना सक्रिय नहीं है। इस समय इसके विपरीत अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है। विश्व मौसम संगठन (WMO) के 3 सितंबर 2026 के ताजा आकलन के अनुसार मौजूदा अल नीनो आने वाले महीनों में और ताकत पकड़ सकता है और सितंबर-नवंबर 2026 तथा दिसंबर 2026-फरवरी 2027 की अवधि में इसके बने रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत बताई गई है।

समुद्र के तापमान से बदलता है मौसम का मिजाज

ला नीना को समझने के लिए भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर को समझना जरूरी है। सामान्य परिस्थितियों में इस क्षेत्र में पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली व्यापारिक हवाएं समुद्र की ऊपरी गर्म परत को पश्चिमी प्रशांत की तरफ धकेलती हैं। ला नीना के दौरान यह प्रक्रिया ज्यादा मजबूत हो सकती है और मध्य तथा पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह अपेक्षाकृत ठंडी हो जाती है।

समुद्र के तापमान में यह बदलाव केवल पानी तक सीमित नहीं रहता। इसके साथ वायुमंडलीय दबाव, हवाओं और बादलों के बनने की प्रक्रिया में भी बदलाव आता है। यही वजह है कि ला नीना को एक क्षेत्रीय समुद्री घटना के बजाय वैश्विक मौसम को प्रभावित करने वाले जलवायु पैटर्न के रूप में देखा जाता है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ला नीना?

भारत में मानसून करोड़ों लोगों की खेती और पानी की जरूरतों से जुड़ा है। ऐसे में प्रशांत महासागर की किसी बड़ी जलवायु घटना पर मौसम वैज्ञानिकों की नजर रहती है।

ला नीना की स्थिति कई बार भारतीय मानसून के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल परिस्थितियों से जुड़ी रही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ला नीना आते ही पूरे भारत में भारी बारिश शुरू हो जाएगी। देश में मानसून का व्यवहार कई दूसरे समुद्री और वायुमंडलीय कारकों से भी तय होता है। इसलिए किसी एक ENSO स्थिति के आधार पर पूरे मौसम का निश्चित अनुमान लगाना सही नहीं है।

इस समय ला नीना नहीं, अल नीनो चर्चा में क्यों है?

मौजूदा समय में तस्वीर ला नीना से बिल्कुल अलग है। NOAA के अगस्त 2026 के आकलन में कहा गया था कि अल नीनो मजबूत हो रहा है और उत्तरी गोलार्ध की शरद तथा सर्दियों के दौरान इसके बहुत मजबूत स्तर पर पहुंचने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक है।

WMO ने भी सितंबर की शुरुआत में अल नीनो के और मजबूत होने की संभावना जताई है। संस्था के अनुसार इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान के सामान्य पैटर्न में बदलाव के रूप में दिखाई दे सकता है और कुछ इलाकों में सूखा, अत्यधिक बारिश या गर्मी जैसी चरम मौसम स्थितियों का खतरा बढ़ सकता है।

भारत में भी इस साल मानसून की स्थिति पर अल नीनो का असर चर्चा में रहा है। सितंबर की शुरुआत में देश के कुछ हिस्सों में बारिश कमजोर रहने की रिपोर्ट सामने आई है। हालांकि पूरे भारत में मौसम एक जैसा नहीं है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के 6 सितंबर के अपडेट में मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना बताई गई, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की गतिविधि अपेक्षाकृत कमजोर रहने का अनुमान दिया गया।

आगे मौसम पर क्या असर पड़ सकता है?

ला नीना और अल नीनो दोनों ENSO चक्र के अलग-अलग चरण हैं और इनकी स्थिति समय के साथ बदल सकती है। इसलिए मौसम वैज्ञानिक समुद्र की सतह के तापमान के साथ हवाओं, वायुमंडलीय दबाव और दूसरे मौसमी संकेतकों की लगातार निगरानी करते हैं।

फिलहाल उपलब्ध ताजा जानकारी में ला नीना के बजाय मजबूत होता अल नीनो प्रमुख स्थिति है। ऐसे में भारत के मौसम, आने वाले महीनों के तापमान और बारिश के पैटर्न को समझने के लिए ENSO की अगली रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।

ला नीना कब लौटेगा या मौजूदा अल नीनो के बाद प्रशांत महासागर किस दिशा में जाएगा, इसका फैसला अभी निश्चित रूप से नहीं किया जा सकता। इसके लिए आने वाले महीनों में समुद्र और वातावरण के नए आंकड़ों का इंतजार करना होगा।

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