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पाकिस्तानी सेना में बड़ा बदलाव, असीम मुनीर के हाथ में तीनों सेनाओं की कमान; कई मोर्चों पर बढ़ी चुनौती

 

पाकिस्तानी सेना में बड़ा बदलाव, असीम मुनीर के हाथ में तीनों सेनाओं की कमान; कई मोर्चों पर बढ़ी चुनौती

पाकिस्तान में सेना की कमान व्यवस्था में हाल ही में बड़ा बदलाव हुआ है। नए रक्षा कानून के बाद फील्ड मार्शल असीम मुनीर को देश की थल सेना के साथ-साथ नौसेना और वायुसेना की संयुक्त संचालनात्मक कमान भी मिल गई है। इस बदलाव के बीच पाकिस्तान को बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा और अफगानिस्तान से लगी सीमा पर आतंकवादी गतिविधियों जैसी सुरक्षा चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।

एक अधिकारी के हाथ में तीनों सेनाओं की कमान

पाकिस्तान की संसद द्वारा पारित Defence Forces of Pakistan Act, 2026 के तहत चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज यानी CDF का नया पद बनाया गया है। असीम मुनीर इस पद पर नियुक्त होने वाले पहले अधिकारी हैं और सेना प्रमुख की जिम्मेदारी भी उनके पास बनी हुई है।

नए ढांचे की खास बात यह है कि CDF को थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच संयुक्त संचालन से जुड़ी वैधानिक कमान दी गई है। इससे पाकिस्तान की पुरानी सैन्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पहले तीनों सेनाओं के बीच समन्वय के लिए चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद था, लेकिन उस पद के पास तीनों सेनाओं पर इस तरह की प्रत्यक्ष संचालनात्मक कमान नहीं थी।

इस बदलाव को पाकिस्तान की सैन्य कमान व्यवस्था में दशकों बाद हुआ बड़ा पुनर्गठन माना जा रहा है। इसके समर्थकों का तर्क है कि संयुक्त कमान से संकट की स्थिति में फैसले लेने और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बेहतर हो सकता है। वहीं आलोचकों ने सैन्य शक्ति के एक ही केंद्र में ज्यादा सिमटने को लेकर सवाल उठाए हैं।

बलूचिस्तान में सेना के सामने बड़ी चुनौती

सैन्य कमान में बदलाव ऐसे समय हुआ है जब पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सुरक्षा स्थिति गंभीर बनी हुई है। पाकिस्तानी सेना के अनुसार, हाल में मस्तुंग, सिबी, क्वेटा और कलात जिलों में 72 घंटे के दौरान कई खुफिया अभियानों को अंजाम दिया गया। सेना ने इन अभियानों में 48 आतंकवादियों के मारे जाने और हथियारों की बरामदगी का दावा किया है।

पाकिस्तानी सेना ने मारे गए लोगों को प्रतिबंधित संगठनों से जोड़ते हुए उन्हें आतंकवादी बताया है। हालांकि ऐसे सैन्य दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना हमेशा संभव नहीं होता, इसलिए इन आंकड़ों को पाकिस्तानी सैन्य पक्ष की जानकारी के रूप में देखना जरूरी है। बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा और सुरक्षा बलों पर हमले पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

असीम मुनीर ने भी हाल में क्वेटा गैरीसन का दौरा किया और बलूचिस्तान की सुरक्षा तथा विकास से जुड़े मुद्दों पर अधिकारियों के साथ चर्चा की। ऐसे समय में उनका दौरा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि प्रांत की सुरक्षा स्थिति पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की प्राथमिकताओं में बनी हुई है।

अफगान सीमा पर भी तनाव

पाकिस्तानी सेना के सामने दूसरा बड़ा सुरक्षा मोर्चा अफगानिस्तान से लगी सीमा है। 3 सितंबर को पाकिस्तान की सेना ने दावा किया कि उत्तर वजीरिस्तान में अफगानिस्तान की ओर से पाकिस्तान में घुसने की कोशिश कर रहे 15 आतंकवादी मारे गए। सेना ने उन्हें तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP से जुड़ा बताया।

पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान पर TTP के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाता रहा है। दूसरी ओर अफगान तालिबान इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता। इस मुद्दे के कारण दोनों देशों के संबंधों में सुरक्षा और सीमा को लेकर तनाव बना हुआ है।

अब आगे क्या होगी सेना की भूमिका?

असीम मुनीर को मिली नई जिम्मेदारी के बाद पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत हो गई है। एक ही अधिकारी के पास थल सेना के नेतृत्व के साथ तीनों सशस्त्र सेनाओं की संयुक्त संचालनात्मक जिम्मेदारी होने से युद्ध, आतंकवाद और सीमा सुरक्षा जैसे मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया बदल सकती है।

हालांकि इस व्यवस्था का वास्तविक असर आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा। पाकिस्तान के लिए चुनौती केवल सैन्य कमान को मजबूत करना नहीं है, बल्कि बलूचिस्तान की हिंसा, अफगान सीमा पर तनाव और देश के भीतर सुरक्षा स्थिति को लंबे समय तक नियंत्रित करना भी है।

फिलहाल इतना साफ है कि पाकिस्तानी सेना देश की सुरक्षा नीति में पहले से भी अधिक केंद्रीय भूमिका में दिखाई दे रही है और असीम मुनीर को मिली नई संवैधानिक-सैन्य जिम्मेदारी ने इस भूमिका को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

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