अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री रास्तों पर बढ़ते जोखिम के कारण तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है। ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का जोखिम जताया जा रहा है।
भारत के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का आयात खर्च बढ़ सकता है और इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है।
ओपेक प्लस ने उत्पादन में बड़ा बदलाव नहीं किया
तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक प्लस के सात प्रमुख देशों की बैठक में अक्टूबर के लिए उत्पादन व्यवस्था में अतिरिक्त बदलाव नहीं करने का फैसला लिया गया है। ऐसे समय में जब आपूर्ति को लेकर पहले से चिंता बनी हुई है, उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी नहीं होने से कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
दूसरी तरफ समुद्री मार्गों पर हमलों की स्थिति गंभीर होती है तो तेल की आपूर्ति और प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि बाजार में आगे कीमत बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
भारत पर पड़ सकता है सीधा असर
अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो भारत का तेल आयात बिल बढ़ सकता है। इसके अलावा परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
महंगे कच्चे तेल की वजह से रुपये पर भी दबाव बनने की संभावना रहती है। तेल खरीदने के लिए अधिक विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ने पर आयात खर्च बढ़ सकता है और रुपये की कमजोरी महंगाई को और प्रभावित कर सकती है।
क्या पेट्रोल-डीजल तुरंत महंगा होगा?
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव जरूर बन सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी का असर घरेलू कीमतों पर कितनी जल्दी और कितना पड़ेगा, यह कई अन्य आर्थिक और नीतिगत कारकों पर निर्भर करता है।
फिलहाल 120 डॉलर प्रति बैरल का स्तर एक संभावित जोखिम है, कोई निश्चित कीमत नहीं। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति, समुद्री आपूर्ति और ओपेक प्लस के फैसले तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमत किस दिशा में जाती है।

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